बगलामुखी माता: दस महाविद्याओं में से एक, जिनकी साधना से विजय का वरदान मिलता है - TheMasterJi.com

बगलामुखी माता: दस महाविद्याओं में से एक, जिनकी साधना से विजय का वरदान मिलता है

 माँ बगलामुखी: शत्रुविनाशक पीताम्बरा शक्ति का रहस्य


​माँ बगलामुखी: शत्रुविनाशक पीताम्बरा शक्ति का रहस्य



​नाम का अर्थ और उत्पत्ति:

संस्कृत के 'वल्गा' शब्द से 'बगला' की उत्पत्ति मानी जाती है, जिसका सीधा अर्थ 'दुल्हन' या 'लगाम' (control) होता है। कुब्जिका तंत्र के अनुसार, इनके नाम के तीन अक्षर— 'व', 'ग', 'ला'—क्रमशः वारुणी (शक्ति), सिद्धिदा (सफलता) और पृथ्वी (आधार) के प्रतीक हैं। अपनी असीम सुंदरता और किसी को भी जड़ (स्तम्भित) कर देने की शक्ति के कारण इन्हें यह नाम मिला है।

​देवी का प्राकट्य:

माना जाता है कि इनका प्राकट्य गुजरात के सौराष्ट्र में हुआ था। कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मांड को नष्ट करने वाले तूफान को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने तपस्या की, जिससे हल्दी के सरोवर से देवी प्रकट हुईं। हल्दी का रंग पीला होने के कारण इन्हें 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है। यद्यपि इन्हें सात्विक और वैष्णव परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन तांत्रिक साधनाओं में इनका स्वरूप शत्रु-दमन के लिए 'तामसी' भी माना गया है।

​दिव्य स्वरूप:

देवी बगलामुखी रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके तीन नेत्र और मस्तक पर अर्धचंद्र है। उनका पूरा परिवेश—वस्त्र, फूल, आभूषण और यहाँ तक कि उनका शरीर भी—स्वर्ण के समान पीला है। उनके स्वरूप में एक हाथ में गदा है और दूसरे हाथ से उन्होंने शत्रु की जीभ को पकड़ रखा है। यह इस बात का प्रतीक है कि देवी न केवल शत्रुओं को चुप कराती हैं, बल्कि साधक को 'वाक्-सिद्धि' (वाणी की शक्ति) भी प्रदान करती हैं।

​प्रमुख शक्तिपीठ और उपासना:

भारत में माँ बगलामुखी के तीन मुख्य ऐतिहासिक केंद्र हैं:

  • ​दतिया (मध्य प्रदेश)
  • ​कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
  • ​नलखेड़ा (मध्य प्रदेश)

​इन स्थानों पर शैव और शाक्त दोनों ही मतों के साधक तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए आते हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में भगवान कृष्ण के परामर्श पर अर्जुन ने विजय प्राप्ति के लिए माँ बगलामुखी की आराधना की थी। उज्जैन और नलखेड़ा के क्षेत्रों में आज भी उनकी विजय गाथाओं के प्रमाण मिलते हैं।

​साधना के लाभ:

माँ की भक्ति केवल शत्रुओं के नाश के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन की बाधाओं को दूर करने, मुकदमों (legal issues) में जीत हासिल करने और वाणी की अशुद्धियों को मिटाने के लिए की जाती है। सबसे पहले ब्रह्मा जी ने इनकी साधना की थी, जिसके बाद नारद मुनि, भगवान विष्णु और भगवान परशुराम ने इस विद्या को आगे बढ़ाया।

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